जिस तन लगिआ इश्क कमाल,


 

जिस तन लगिआ इश्क कमाल,

नाचे बेसुर ते बेताल।

 

दरदमन्द नूं कोई न छेड़े,

जिसने आपे दुःख सहेड़े,

जम्मणा जीणा मूल उखेड़े,

बूझे अपणा आप खिआल ।

 

जिसने बेस इश्क दा कीता,

धुर दरबारों फतवा लीता,

जदों हजूरों प्याला पीता,

कुछ ना रह्या सवाल जवाब।

 

जिसदे अन्दर वस्स्या यार,

उठिया यार ओ यार पुकार,

ना ओह चाहे राग न तार,

ऐवें बैठा खेडे हाल।

 

बुल्हिआ शाह नगर सच पाया,

झूठा रौला सब्ब मुकाया,

सच्चियां कारण सच्च सुणाया,

पाया उसदा पाक जमाल ।

~ बाबा बुल्लेशाह 

Comments

Popular posts from this blog

दिल्ली में आचार्य प्रशांत जी की पुस्तकों का स्टाल कहाँ लगता है ?

बुक स्टाल अवलोकन 22 दिसंबर 2024