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Showing posts from December, 2024

मोरा हीरा हेरायगा कचरे में,

  मोरा हीरा हेरायगा कचरे में, मोरा हीरा हेरायगा कचरे में । मोरा हीरा हेरायगा कचरे में, साहब तेरी साहिबी, हर घट रही समाय। ज्यों मेंहदी के पात में, लाली लखी न जाए।। कोई पूरब कोई पश्चिम देखे, कोई पानी कोई फ़िकरे में। पाँच पच्चीस तीन के भीतर, लाग रहे बहु फ़िकरे में। लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल। लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।। सुर नर मुनि यति पीर औलिया, उलझ रहे बहु नखरे में । कहें कबीर परख जिन पाया, बाँध लिया है अचरे में । ज्यों तिल माहिं तेल है, ज्यों चकमक में आग। तेरा साईं तुझ में है, जाग सके तो जाग।। मोरा हीरा हेरायगा कचरे में, मोरा हीरा हेरायगा कचरे में । ~ कबीर साहब

सबसे बड़ा अन्धविश्वास क्या है ?

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 सबसे बड़ा अन्धविश्वास क्या है ? तुम कुछ प्राप्त  कर लो तो  तुम्हारे जीवन में खुशियाँ आ जाएँगी,  ये सबसे बड़ा अन्धविश्वाश है।   सबसे पहले इसी अन्धविश्वास को  अपने जीवन से हटाना है। 

पुराने रीति रिवाज और मान्यताएं

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तुम कुछ प्राप्त  कर लो तो तुम्हारे जीवन में खुशियाँ आ जाएँगी, ये सबसे बड़ा अन्धविश्वाश है।  सबसे पहले इसी अन्धविश्वास को अपने जीवन से हटाना है। 

हमारे जीवन का मूल दुःख क्या है ? कामनायें

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salaam baalak trust ngo

 

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साधो ये मुरदों का गांव

  साधो ये मुरदों का गांव पीर मरे पैगम्बर मरिहैं मरि हैं जिन्दा जोगी राजा मरिहैं परजा मरिहै मरिहैं बैद और रोगी चंदा मरिहै सूरज मरिहै मरिहैं धरणि आकासा चौदां भुवन के चौधरी मरिहैं इन्हूं की का आसा नौहूं मरिहैं दसहूं मरिहैं मरि हैं सहज अठ्ठासी तैंतीस कोट देवता मरि हैं बड़ी काल की बाजी नाम अनाम अनंत रहत है दूजा तत्व न होइ कहत कबीर सुनो भाई साधो भटक मरो ना कोई

मोको कहां ढूंढे रे बंदे

  मोको कहां ढूंढे रे बंदे   मोको कहां ढूंढे रे बंदे , मैं तो तेरे पास में। मोको कहां ढूंढे रे बंदे , मैं तो तेरे पास में   दौड़त दौड़त दौड़िया , जेति मन की दौड़ । दौड़ी थका मन थिर भया , वस्तु ठौर की ठौर।।   ना तीरथ में ना मूरत में , ना एकांत निवास में ना मंदिर में , ना मस्जिद में , ना काबे कैलाश में   मैं तो तेरे पास में   ज्ञानी भूले ज्ञान कथि , निकट रहा निज रूप।   बाहिर खोजे बापुरे , भीतर वस्तु अनूप।।   ना मैं जप में , ना मैं तप में , ना मैं व्रत उपवास में । ना में क्रिया क्रम में रहता , ना ही योग संन्यास में। मैं तो तेरे पास में.....   ज्यों तिल माहीं तेल है , ज्यों चकमक में आग।   तेरा साई तुझ में है , जाग सके तो जाग।।   नहीं प्राण में नहीं पिंड में , ना ब्रह्माण्ड आकाश में । ना मैं त्रिकुटी भवर में , मैं तो तेरे पास में.... सब स्वांसो के स्वास में ।   जो तू चाहे मुक्ति को , छोड़ से सबकी आस ।   मुक्त ही जैसा हो रहे , सब कुछ तेरे पास।।

पीले प्याला हो मतवाला, प्याला नाम अमीरस का रे ॥

  पीले प्याला हो मतवाला , प्याला नाम अमीरस का रे ॥   बालपन सब खेल गँवाया , ज्वान भयो नारी बस का रे , वृद्ध भयो तन काँपन लागे , खाट पर न जाय खसका रे ॥ १ ॥   नाभि कमल बिच है कस्तूरी , जैसे मिरग फिर बन का रे ।   बिन सतगुरु इतना दुख पाया , बैद मिला नहिं इस तन का रे ॥ २ ॥   मात पिता बन्धू सुत तिरिया , संग नहीं कोई जाय सखा रे ।   जब लग जीवै भजन भक्ति करु , धन यौवन है दिन दस का रे ॥ ३ ॥   जन्म मरण से बचना चाहो , तो छोड़ो कामिनि चसका रे।   कहैं कबीर सुनो भाई साधो , नख सिख पूर रहा विष का रे ॥ ४  

अब हम गुम हुए, गुम हुए, गुम हुए प्रेम नगर के शहर

  अब हम गुम हुए , गुम हुए , गुम हुए प्रेम नगर के शहर   अपने आप नूं खोज रहा हूं ना सिर हाथ ना पैर   प्रेम प्रेम सब कोई कहे , प्रेम ने चिन्हे कोय।   जा मारग साहब मिले , प्रेम कहावे सोय।।   किथै पकड़ लै चलै घरां थीं कौन करै निरवैर   खुदी खोई अपना आप चीना तब होई कुल खैर   प्रेम प्याला सो पिए , सीस दक्षिणा देय। लोभी सीस न दे सके , नाम प्रेम का लेय ।।   बुल्ला साई दोई जहानी कोई न दिखता गैर भजन - बाबा बुल्लेशाह , दोहे - संत कबीरदास

मन लागो यार फकीरी में

  मन लागो यार फकीरी में मन लागो यार फकीरी में ।   जो सुख पायो राम भजन में , सो सुख नाही अमीरी में ॥   भला बुरा सब की सुन लीजै , कर गुजरान गरीबी में ॥   प्रेम नगर में रहन हमारी , भली बन आई सबुरी में ॥   हाथ में खूंडी , बगल में सोटा , चारो दिशा जागीरी में ॥ आखिर यह तन ख़ाक मिलेगा , काहें फिरें मगरूरी में ॥ कहत कबीर सुनो भाई साधो , साहब मिले सबुरी में ॥

राम भजा सो जीता जग में, राम भजा सो जीता ॥

  राम भजा सो जीता जग में , राम भजा सो जीता ॥   हाथ सुमरनी , पेट कतरनी , पढ़त भगवत गीता ॥   हृदय शुद्ध किया नहीं बौरे , कहत सुनत दिन बीता ॥   न देव की पूजा किन्ही , गुरु से रहा अमीता ॥   धन यौवन सब यहीं रहेगा , अंत समय चले रीता ॥   बावरिया ने भाँवर डारी , मोह डाल सब कीता ॥   कहें कबीर काल धर खैय्हें , जैसे मृग को चीता ॥  

तोहि मोहि लगन लगाय रे फकीरवा ।

  तोहि मोहि लगन लगाय रे फकीरवा ।   सोबत ही मैं अपने मंदिर में , सबद बान मारि जगाये रे फकीरवा ।   डूबत ही भव के सागर में , बहियां पकरि समुझाये रे फकीरवा ।   एकै बचन बचन नहिं दूजा , तुम मोसे बंद छुड़ाये रे फकीरवा ।   कहैं कबीर सुनो भाई साधो , प्राणन प्राण लगाये रे फकीरवा ।

जागु पियारी अब का सोवै, रैन गई दिन काहे को खोवै ।

  जागु पियारी अब का सोवै , रैन गई दिन काहे को खोवै ।   जिन जागा तिन मानिक पाया , तै बौरी सब सोये गंवाया ।   पिया तेरे चतुर तू मूरख नारी , कबहु न पिया की सेज सँवारी ।   तें बौरी बौरा पन कीन्है , भर जोवन आपन पिया न चीन्है ।   जाग देख पिया सेज न तेरे , तोहि छोड़ उठ गये सवेरे । कहे कबीर सोइ धुन जागे , सबद बान अंतर लागे । ~ कबीर साहब  

उड़ जाएगा, हंस अकेला,

  उड़ जाएगा , हंस अकेला , यह जग दर्शन का मेला।   जैसे पात गिरे तरुवर से , मिलना बहुत दुहेला , न जाने किधर गिरेगा , लगया पवन का रेला।   जब होवे उमर पूरी , जब छूटेगा हुकम हजूरी , यम के दूत बड़े मजबूत , यम से पड़ा झमेला।   दास कबीर हरि के गुण गावे , बाहर को पारन पावे , गुरु की करनी गुरु जाएगा , चेले की करनी चेला।