मोरा हीरा हेरायगा कचरे में,
मोरा हीरा हेरायगा कचरे में, मोरा हीरा हेरायगा कचरे में । मोरा हीरा हेरायगा कचरे में, साहब तेरी साहिबी, हर घट रही समाय। ज्यों मेंहदी के पात में, लाली लखी न जाए।। कोई पूरब कोई पश्चिम देखे, कोई पानी कोई फ़िकरे में। पाँच पच्चीस तीन के भीतर, लाग रहे बहु फ़िकरे में। लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल। लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।। सुर नर मुनि यति पीर औलिया, उलझ रहे बहु नखरे में । कहें कबीर परख जिन पाया, बाँध लिया है अचरे में । ज्यों तिल माहिं तेल है, ज्यों चकमक में आग। तेरा साईं तुझ में है, जाग सके तो जाग।। मोरा हीरा हेरायगा कचरे में, मोरा हीरा हेरायगा कचरे में । ~ कबीर साहब