सूरा को अंग: १. साधो रण में आइ के, पीछे रहे न सूर। साईं के सन्मुख रहे, जूझे सदा हुजूर।। २. भागे भला न होएगा, कहाँ धरोगे पाँव। सिर सौंपो सीधे लड़ो, काहे करो कुदाव।। ३. साधो साँचा सूरमा, कबू न पहिरे लोह। जीवन के बंध खोल के, छांड़ै तन का मोह।। ४. सूरा सोई सराहिये, लड़े मुक्ति के हेत। पुर्ज़ा पुर्ज़ा कट पड़े, तो भी ना छाड़े खेत।। ५. सूरा नाम रखाय के, अब क्यों डरना वीर। अड़े रहना मैदान में, सम्मुख सहना तीर।। ६. साधो रण में मिट रहा, टूटन दे हंकार। जग की मरनी क्यों मरे, दिन में सौ सौ बार।। ७. आग आँच सहना सुगम, सुगम खड़ग की धार। नेह निबाहन एक रस, महा-कठिन व्यवहार।। ८. सूरा सोई सराहिये, लड़े मुक्ति के हेत। पुर्ज़ा पुर्ज़ा कट पड़े, तो भी ना छाड़े खेत।। ९. तीर तोप से जो लड़े, सो तो सूर न होय। माया तजि भक्ति करे, सूर कहावे सोय।। १०. सूरा के मैदान में, कायर का क्या काम। कायर भागे पीठ दे, सूर करे संग्राम।। ११. गगन दमामा बाजिया, पड़े निशाने घाव। खेत बुहारे सूरमा, मोहे मरण का चाव।। ~ कबीर साहब