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किसी चीज़ को भोगकर चैन नहीं मिलता है, यह जानना ही चैन का मिलना है

किसी चीज़  को भोगकर  चैन नहीं  मिलता है,  यह जानना  ही चैन का  मिलना है किसी चीज़किसी चीज़  को भोगकर  चैन नहीं  मिलता है,  यह जानना  ही चैन का  मिलना है को भोगकर चैन नहीं मिलता है, यह जानना ही चैन का मिलना है  

कबीर साहब के कुछ दोहे

साहब से सब होत है, बन्दे से कुछ नाहीँ। राई से परबत करे, परबत राई माहीं।। ना कुछ किया न कर सका, ना करने जोग शरीर। जो कुछ किया साहिब किया, ताते भया कबीर।। न कुछ हुआ, न हो रहा, न कुछ होवन हार।   एक नूर का तेज़ है, पूरा यह संसार।। ~ कबीर साहब

Geeta 5.19

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अब से खबरदार रहो भाई

 अब से खबरदार रहो भाई अब से खबरदार रहो भाई । गुरु दीन्हा माल खज़ाना राखो जुगत लगाई । पाव रति घटने नहिं पावै दिन दिन होत सवाई ।। क्षमा शील की माला पहनो ज्ञान वस्त्र लगाई । दया की टोपी सिर पर दे के और अधिक बन आई ।। वस्तु पाई गाफ़िल मत रहना हर दिन करो कमाई । घट के भीतर चोर लगत हैं बैठे घात लगाई ।। बाहर ज्ञान रहे सिपाही भीतर भक्ति अधिकाई । सुरति ज्योति हर दम सुलगे कस कर तेल चढ़ाई ।। अब से खबरदार रहो भाई । अब से खबरदार रहो भाई ।

निर्वाण षट्कम

 निर्वाण षट्कम 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम्  न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे  न च व्योम भूमिर् न तेजो न वायु:  चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम।।१।। न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु:  न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश:  न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू  चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥२॥  न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ  मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:  न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष:  चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥३॥  न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम्  न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा: न यज्ञा:  अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता  चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥४॥  न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद:  पिता नैव मे नैव माता न जन्म  न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य:  चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥५॥  अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ  विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्  न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय:  चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥६॥

साधारण प्रेम Vs परम प्रेम

 साधारण प्रेम माँगता है।  इसमें हम दूसरों से आशा रख रहे होते है प्रेम की।  परम प्रेम बाँटता है।  दूसरों को मानसिक दुःख से बाहर निकालता है। 

कबीर साहब के दोहे जो एक साधक को अपने से ही संघर्ष करने के लिए प्रेरित करते हैं

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  सूरा को अंग:  १. साधो रण में आइ के, पीछे रहे न सूर। साईं के सन्मुख रहे, जूझे सदा हुजूर।। २. भागे भला न होएगा, कहाँ धरोगे पाँव। सिर सौंपो सीधे लड़ो, काहे करो कुदाव।। ३. साधो साँचा सूरमा, कबू न पहिरे लोह। जीवन के बंध खोल के, छांड़ै तन का मोह।। ४. सूरा सोई सराहिये, लड़े मुक्ति के हेत। पुर्ज़ा पुर्ज़ा कट पड़े, तो भी ना छाड़े खेत।। ५. सूरा नाम रखाय के, अब क्यों डरना वीर। अड़े रहना मैदान में, सम्मुख सहना तीर।। ६. साधो रण में मिट रहा, टूटन दे हंकार। जग की मरनी क्यों मरे, दिन में सौ सौ बार।। ७. आग आँच सहना सुगम, सुगम खड़ग की धार। नेह निबाहन एक रस, महा-कठिन व्यवहार।। ८. सूरा सोई सराहिये, लड़े मुक्ति के हेत। पुर्ज़ा पुर्ज़ा कट पड़े, तो भी ना छाड़े खेत।। ९. तीर तोप से जो लड़े, सो तो सूर न होय। माया तजि भक्ति करे, सूर कहावे सोय।। १०. सूरा के मैदान में, कायर का क्या काम। कायर भागे पीठ दे, सूर करे संग्राम।। ११. गगन दमामा बाजिया, पड़े निशाने घाव। खेत बुहारे सूरमा, मोहे मरण का चाव।। ~ कबीर साहब