अब हम गुम हुए, गुम हुए, गुम हुए प्रेम नगर के शहर

 

अब हम गुम हुए, गुम हुए, गुम हुए प्रेम नगर के शहर 

अपने आप नूं खोज रहा हूं ना सिर हाथ ना पैर

 

प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम ने चिन्हे कोय।

 जा मारग साहब मिले, प्रेम कहावे सोय।।

 

किथै पकड़ लै चलै घरां थीं कौन करै निरवैर 

खुदी खोई अपना आप चीना तब होई कुल खैर

 

प्रेम प्याला सो पिए, सीस दक्षिणा देय।

लोभी सीस न दे सके, नाम प्रेम का लेय ।।

 

बुल्ला साई दोई जहानी कोई न दिखता गैर


भजन - बाबा बुल्लेशाह, दोहे - संत कबीरदास

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