Geeta with Acharya Prashant - Satra Se Notes

·        सत्य पर आधारित है माया।

·        आत्मा पर आधारित हो गया सारा संसार।

·        धारण = ढकने या छुपाने को लेकर

·        अहंकार की सारी चेस्टा स्वयं को तृप्ति देने के लिए होती है।

·        आत्मा, अहंकार की पालक है।

·        आत्मा की खातिर ही अहंकार सब कुछ करता है।

·        आत्मा न हो तो अहंकार अस्तित्व में ही नहीं आएगा।

·        हम जिसको मैं समझ रहे है वो झूठ  है।

·        युद्ध भी शांति के लिए हो रहे है।  ठीक उसी प्रकार अहंकार भी आत्मा से आता है।

·        जहाँ शब्द होंगे वहां छवि होगी।

·        उच्चतम को भी हम देह की छवि में बाँध लेते है क्यूंकि देह भाव सबसे ज्यादा है हमारे अंदर तो हम उच्चतम को भी देह दे देते है। हर चीज भौतिक होती है देह भाव वाले के लिए।

·        हमारी सारी चेष्टा देह को सवारने सजाने बचाने के लिए ही होती है तो फिर वो प्रभु को भी देह दे देता है ताकि उसकी आड़ में हम अपनी वासनाएँ पूरी कर सके।

·        ग्रन्थ हमें सुधारने आये थे हमने ग्रन्थ ही बिगाड़ दिए।

·        ग्रन्थ  की उच्चतम शिक्षा है निराशी निर्ममो। हमने प्रभु को लेकर ही तरह तरह की ममता भरी कहानियाँ बना दी।  ये चमत्कार होता है अहंकार का।

·        मित्रता / प्रेम होगा तो ज्ञान ही दिया जायेगा न। हमें दूसरे से श्रेष्ठतम (ज्ञान / गीता ) ही लेना चाहिए और उसे भी वही देना चाहिए । 

·        जो हमें पसंद होता है हम उसी के हिसाब से प्रभु पर भी वही आरोपित कर देते है।

·        सूत्रों  को नकार में पढ़ना होता है।

·        जिसके लिए अभी कर्म कर्मफल कर्त्तव्य है वो मिथ्या है।  आत्मा नहीं है।

·        हम मिथ्या बने बैठे है इसलिए तड़पते है। झूठ बने बने बोलते है कि हम आत्मा है।

·        खेल अपने झूठ को उघाड़ने का है।

·        अहम् जब प्रकर्ति जैसा हो जाता है तो, आत्मा हो जाता है।  प्रकर्ति को कुछ नहीं बनना होता। 

·        प्रकर्ति  से रिश्ता नहीं बनाना होता प्रकर्ति ही हो जाना है।  जो प्रकर्ति हो गया वो प्रकर्ति की धारा में बहने लग जाता है।

·        दुनिया के साथ जब निर्भरता का रिश्ता नहीं होता तब साक्षित्व आता है। अंदुरनी स्वास्थय पर कोई फर्क नहीं पड़ता।  दुनियादारी के प्रति कोई भेद भाव नहीं।

·        कोई अनुभव मेरा  कुछ बिगाड़ नहीं सकता और न हीं कोई अनुभव मुझे कुछ दे सकता है। कुछ भी हो जाए उसमें कोई बहुत खुशी की बात नहीं, कुछ भी हो जाए उसमें किसी ऐसे दुख की बात नहीं है कि मैं भीतर से तबाह हो जाऊं।

·        सब मेरे लिए सम हो गया। जब सब सम हो गया तो मैं किसी को भी ठुकराऊं कैसे।

·        जैसे हमने प्रभु शब्द के साथ खिलवाड़ किया है वैसे ही हमने आध्यात्मिक व्यक्ति की छवियों के साथ भी खिलवाड़ किया है।

·        अहंकार जिसको विशिष्ट बनाता है उसको भी मार डालता है और जिससे नफरत करता है उसको भी मार डालता है अपनी कड़वाहट से ।

·        संसारी की हालात बहुत ख़राब रहती है।  उसको पग पग पर चुनना पड़ता है।

·        गीता आपको सब मूर्खतापूर्ण कर्तव्य से मुक्ति दे देती है। इसलिए सांसारियों के लिए इतनी खतरनाक है गीता और इसलिए उनके लिए इतना जरूरी था गीता के अर्थ को विकृत करना।


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