वारि जाऊँ मैं सतगुरु के

 वारि जाऊँ मैं सतगुरु के

 

वारि जाऊँ मैं सतगुरु के, किया मेरा भरम सब दूर।

चंद चढ़ा कुल आलम देखे, मैं देखूँ भरम दूर।।

 

हुआ प्रकाश आस गयी दूजी, उगिया निर्मल नूर।

माया मोह तिमिर सब नाशा, पाया हाले हुज़ूर।।

 

विषय विकार लार है जेता, किया सबकुछ धूर।

पिया पियाला सुधि–बुधि बिसरी, हुआ चकनाचूर।।

 

हुआ अमर मरैं नहीं कबहूँ, पाया जीवन मूल।

बंधन कटा छूटिया जम से, किया दरस मंजूर।।

 

ममता गई भई उर समता, सुख-दुख डारा दूर।

समझे बनै कहे नहीं आवै, भयो आनंद भरपूर।।

 

कहें कबीर सुनो भाई साधो, बाजिया निर्मल तूर।

वारि जाऊँ मैं सतगुरु के,  किया मेरा भरम सब दूर।।

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